2--तीव्र रोग शत्रु नहीं मित्र होते हैं---तीव्र रोग चूंकि शरीर एक उपचारात्मक एक प्रयास हैं, अतः ये हमारे शत्रु नहीं हैं।जीर्ण रोग तीव्र रोग दबाने से और गलत उपचार से पैदा होता हैं।प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगों को दो श्रेणी में बांटा गया हैं --1-तीव्र रोग,2-जीर्ण रोग।जीर्ण रोग वे होते हैं जो शरीर में दबे रहते हैं और लम्बे समय के बाद प्रकट होते हैं।जिनके शरीर में रहते हुए हमारा शरीर काम तो करता हैं लेकिन अन्दर से क्षतिग्रस्त होते रहता हैं और लम्बे समय तक शरीर में बने रहते है क्योंकि इनकी जड़ें शरीर में जम चूंकि होती हैं।इसके विपरित तीव्र रोग वह होते हैं जिनकी अवस्था में शरीर कार्य करने मे ं सक्षम नहीं हो पाता हैं और यह शरीर में तीव्र गति से आते हैं और वैसे ही तीव्र गति से चले जाते हैं।प्राकृतिक चिकित्सा में तीव्र रोगों को मित्र कहा गया हैं जिस प्रकार सामने से वार करने वाले से खतरनाक छिप कर वार करने वाला होता हैं।उसी प्रकार तीव्र रोग समाने से वार करता हैं इससे व्यक्ति को संभालने का अवसर मिल जाता हैं।
तीव्र रोग के कारण शरीर से विजातीय द्रव्यों का निसकासन भी हो जाता हैं जैसे--उल्टीई,दस्त होने से पेट और आंतों की सफाई हो जाती हैं।जुकाम व बुखार में यही विजातीय द्रव्य पसीने के रुप मे बाहर निकलते है और जीवन शक्ति का पुनः विकास होने लगता हैं।तीव्र रोग हमरे शरीर के अन्दर के विष को बाहर निकालने का काम करता हैं, किन्तु हम घबरा कर औषधियों के माध्यम से उनके कार्य मेन रुकावट डाल देते हैं जिससे तीव्र रोग कुछ समय बाद जीर्ण रोग का रुप धारण कर लैतेहैं। उदाहरण के लिए समान्य सर्दी जुकाम जो मौसम बदलने के कारण हमारे शरीर की प्रतिक्रिया होती हैं जिसके कारण मल बाहर निकलना चाहता हैं लेकिन हम औषधियोंको खाकर हम इसे रोक देते हैं और कुछ समय बाद यही अस्थमा, बोकाईटिस,सायनस जैसे जीर्ण बिमारीयों के रूप में सामने आते हैं।तीव्र रोग हमरे भूल का स्मरण कराते हैं।गलत आहार के कारण उल्टी और दस्त ठण्डी चीजों के अधिक सेवन के कारण सर्दी जुकाम आदि उसके कारण हैं।इसलिए ही इन्हें मित्र कहाँ गया हैं क्योंकि सच्चा मित्र ही हमें हमारी भूलो की पहचान करा सकता हैं।जिससे वह भूल दोहरायी न जा सके ।
शेष अगले दिन ------
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