3-रोग का कारण कीटाणु नहीं--रोग के मुख्य कारण कीटाणु नहीं हैं।जीवाणु शरीर में जीवन शक्ति के ह्रास होने के कारण एवं विजातीय पदार्थों के संग्रह के पश्चात तब आक्रमण कर पाते है,जब शरीर में उनके रहने और पनपने लायक अनुकूल वातावरण तैयार हो जाता हैं, अतः मूल कारण विजातीय पदार्थ हैं।उपर्युक्त सिध्दांत से स्पष्ट हो जाता हैं कि रोग का एक मात्र कारण विजातीय द्रव्य हैं तो कीटाणु रोग का कारण कैसे हो सकते हैं।स्वास्थ्य शरीर में कीटाणुओं का अस्तित्व नहीं होता हैं लेकिन इसके विपरीत रोगियों में विभिन्न प्रकार के कीटाणु प्रवेश करते रहते हैं और रोगी को जरजर करते रहते हैं।ऐसा क्यों होता हैं, यह एक प्राकृतिक नियम हैं कि सृष्टि में जितने पदार्थ हैं इनके सूक्ष्म परमाणु अनवरत रूप से गतिशील रहते हैं।जिन वस्तुओं के परमाणु एक सी गति रखते हैं, उनमें परस्पर आकर्षण होते हैं और विरुध गति के परमाणु एक-दूसरे से भागते हैं ।अतः इस सिध्दांत के अनुसार कीटाणुओं का अस्तित्व उन्हीं शरीर में होता हैं जिनमें पहले से ही विजातीय द्रव्य विद्यमान हो अथवा जो रोग ग्रस्त हैं या जीवनी शक्ति कमजोर हो क्योंकि विजातीय द्रव्य के कारण जीवन शक्ति का ह्रास होता हैं, उस अवस्था में कीटाणुओं का प्रवेश शरीर में होता हैं।
जिस प्रकार गुड के पास ही मक्खियां आती हैं।ठीक उसी प्रकार ही गंदगी में मच्छर आते हैं, क्योंकि की कीटाणुओं को जीवित रहने के लिए उनका आहार चाहिए जो कि स्वास्थ्य व्यक्ति में उन्हें नहीं मिलता और वे जीवित नहीं रह पाते।इसके विपरीत रोगी के शरीर में उनका चौगुना विकास होता हैं।यही कारण हैं कि किसी भी प्रकार के कीटाणुओं के संक्रमण में 100℅लोग प्रभावित नहीं होते, वह लोग उसकि चपेट में आते हैं जिनका रहन-सहन सही नहीं हैं।जिनकी जीवन शक्ति प्रबल होती हैं ,उनमें कीटाणु जीवित नहीं रह पाते इस लिए वह स्वस्थ्य रहते हैं ।इससें स्पष्ट है कि रोग के प्रभाव का प्रथम कारण एकमात्र विजातीय द्रव्य ही होते हैं कीटाणु नहीं।
शेष अंक अगले दिन-------
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें