4-प्राकृतिक स्वयं चिकित्सक हैं -----प्राकृति स्वयं सबसे बड़ी चिकित्सक हैं। शरीर में स्वयं रोगों से बचने व अस्वस्थ हो जाने पर पुनः स्वस्थ प्राप्त करने की क्षमता विद्यमान हैं।प्रकृति जीव का संचालन करती हैं जो प्रत्येक जीवन के पार्श्व में रहकर उसके जन्म ,मरण ,स्वास्थ्य एवं रोग आदि का ध्यान रखती हैं ,उस महान शक्ति को जीवनी शक्ति, प्राण आदि कहते हैं।शरीर की समस्त क्रियाएं इसी के माध्यम से संपन्न होतीं हैं। हमारा खाना पीना, बोलना, चलना, उठना, बैठना सब इसी पर निर्भर हैं। माँ अपने बच्चों के लिए सब बातों का जैसे ध्यान रखती हैं, वैसे ही प्राकृति हमारा ख्याल रखती हैं और जब तक बच्चा माँ के पास रहता हैं ,वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करता हैं ।जिस प्रकार खाना खिलाते समय यदि खाना अटक जाये तो माँ बच्चे के पीठ पर जोर से मारती हैं, पानी पिलाती हैं।ठीक इसी प्रकार से प्राकृति भी हर तरह से ध्यान रखती हैं।जब खाना गलती से श्वास नली में चला जाता हैं तो प्राकृति स्वयं ही तुरंत खाँसी उत्पन्न कर उसे बाहर निकल देती हैं।
इसी प्रकार जबब कोई भी जहरीली चीज मुँह में चली जाती हैं तो तुरंत उल्टी होने लगती हैं और जहर बाहर निकाल जाता हैं। घाव हो जाने पर उसे कौन भरता हैं?हड्डी टूट जाने पर उसे कौन जोड़ता हैं?चिकित्सक केवल सहारा देता हैं, लेकिन हड्डी को जोड़ नहीं सकता ।यह कार्य केवल और केवल प्रकृति रुप में माँ ही कर सकती हैं।संसार में प्रकृति से बड़ा चिकित्सक कोई नहीं हैं, प्रकृति ही सभी साध्य व असाध्य रोगों का उपचार करती हैं।प्राकृतिक चिकित्सा तो प्रकृति के कार्य में सहायक के रुप में कार्य करता. हैं।
इस अंक का शेष भाग अगले दिन --------
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