रविवार, 6 जून 2021

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत

 8-- प्राकृतिक चिकित्सा में दवे रोग उभरते हैं -- प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा रोग भी उभरकर ठीक हो जाते हैं वर्तमान औषधि चिकित्सा में जहां उभरे रोग दब जाते हैं उसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सा में दबे रूम उभरते हैं जिसके कारण कई रूबी और विश्वास करते हैं लगते हैं कि उनकी बीमारियां बढ़ गई हैं जबकि बीमारियां बढ़ती नहीं है बल्कि वह प्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष में आ जाती हैं जिससे उनका उपचार किया जा सकता है प्राकृतिक चिकित्सा में संपूर्ण शरीर का उपचार किया जाता है जिससे संपूर्ण शरीर के विजातीय द्रव्य बाहर निकलते हैं जिससे शरीर में दबे अन्य रोग भी बाहर निकलते हैं जो उचित उपचार से जल्द ही चले जाते हैं! उभार को चिकित्सीय भाषा में रोग की तीव्र रोग की अपकर्ष अवस्था पुराने रोग का प्रत्यावर्तन रोग उत्पन्न संकट आज कई नामों से पुकारते हैं इस का सामान्य अर्थ है कि एक रोग का तीव्र अवस्था में अलग-अलग स्थानों में विश्व का बाहर निकलना जो उपद्रव कहलाते हैं प्राकृतिक चिकित्सा में इसे सकारात्मक रूप में लिया जाता है क्योंकि इसका अर्थ है हमारी जीवनी शक्ति अपना कार्य कर रही है जिस प्रकार एक सामान्य जोर की चिकित्सा के समय तीव्र सिर दर्द व पेट दर्द एवं दस्त भी हो सकते हैं क्योंकि सिर दर्द होने पर हम दवा से दबा देते हैं इसी प्रकार पेट दर्द होने पर भी हम इसे दवा से दबा देते हैं और दस्त को रोक शरीर में ही अलग-अलग स्थानों पर जमा हो जाता है और प्राकृतिक उपचार के समय या बाहर निकलने का प्रयास करता है जिससे सभी रूप उभर आते हैं लिए

   एक प्राकृतिक चिकित्सक का कर्तव्य है कि इन सुधारों की अनदेखी न करें और तत्काल उनके चिकित्सा करें जिससे रोगी की जीवनी शक्ति का अधिक 69 हो रोगी को इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है रोगी को यह सोचना चाहिए कि उनका रोग छोड़ जड़ से समाप्त हो रहा है जिससे उसके दोबारा होने की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है

9-- प्राकृतिक चिकित्सा में मन शरीर तथा आत्मा तीनों की चिकित्सा की जाती है -- प्राकृतिक चिकित्सा में शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक तीनों पशुओं की चिकित्सा एक साथ की जाती है शरीर मन और आत्मा तीनों के सामंजस्य का नाम ही पूर्ण स्वस्थ है क्योंकि शरीर के साथ मन जब तक स्वस्थ नहीं है तब तक व्यक्ति को पूर्ण स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है और शरीर मन तभी स्वस्थ रह सकते हैं जब आत्मा स्वस्थ हो केवल शरीर को ही स्वस्थ रखना मनुष्य का कर्तव्य नहीं है क्योंकि मन और आत्मा शरीर के अभिन्न अंग है बिना मन के खुश हुए हमारी इंद्रियां कैसे खुश रह सकती हैं यदि मन स्वस्थ नहीं है तो विशालकाय शरीर में भी कुछ समय में समाप्त हो जाता है प्राकृतिक चिकित्सा में इन तीनों की स्वास्थ्य उन्नति पर बराबर ध्यान रखा जाता है

   यह प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता है कि प्राकृतिक चिकित्सक मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य को उससे शारीरिक स्वास्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं और आत्मिक स्वास्थ्य बल को सर्वोपरि मानते हैं क्योंकि शरीर तभी स्वस्थ होगा जब आत्मा और मन स्वस्थ होता है

  भारतीय दर्शन के अनुसार आध्यात्मिक रूप से मनुष्य ही पूर्ण रूप से स्वस्थ होता है वही जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है क्योंकि आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही एक स्वस्थ समाज की स्थापना कर सकता है जहां हिंसा गणेश क्रोध घृणा आज विकृत मानसिकता न पनप सकें प्राकृतिक चिकित्सा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही महत्व चिकित्सा राम नाम से कितना पर बल देती है जिससे मनुष्य आत्म संयम सीख सके और अपनी जीवनशैली को बदलकर संपूर्ण जीवन को उचित दिशा दे सके

10-- प्राकृतिक चिकित्सा में उत्तेजक औषधियों के सेवन का प्रश्न ही नहीं -- धीरे खाती है आज मिलने वाली दवा पर कुछ समय बाद प्रतिबंध लग जाता है सभी दवाओं पर सावधानी के निर्देश दिए रहते हैं प्रोफेसर एक क्लार्क के अनुसार हमारी सभी आरोग्य कारी औषधियां बिष हैं और इसके फलस्वरूप औषधि की हर एक मात्रा रोगी की जीवनी शक्ति का ह्रास करती है लिए

    कीटाणु नाशक शक्ति को बढ़ाता है प्राकृतिक चिकित्सा में कितनी औषधियों का प्रयोग वर्जित माना जाता है प्राकृतिक चिकित्सा में विषय ली औषधियों को शरीर के लिए अनावश्यक ही नहीं घातक भी समझा जाता है प्राकृतिक चिकित्सा है दवा नहीं औषधि का काम रोग छुड़ाना नहीं है बल्कि यह वह सामग्री है जो प्रकृति के द्वारा मरम्मत के काम में लाई जाती है इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा में सभी सो प्राण खाद्य सामग्री यही औषधि हैलिए

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               समाप्त l

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