प्राकृतिक चिकित्सा की मान्यता हैं कि रोग एक हैं और उसका इलाज भी एक हैं अतः कोई भी असाध्य से असाध्य रोग हो इस चिकित्सा से उसका उचित समय से निराकरण किया जा सकता हैं।रोगी को ठीक हो जाने पर पुनः उसको रोगी होने की सम्भावना क्षीण हो जाती हैं।प्राकृतिक चिकित्सा से रोग जड़ से दूर होते हैं।स्वास्थ्य के संबंधित नियमों का पालन तथा किसी भी काम में अति न करना प्राकृतिक चिकित्सा का मुख्य सिध्दांत हैं।प्रकृति के नियमों को तोड़ने से बीमारियां पैदा होती हैं ।जबकि प्रकृति के नियमों के पालन करने से हमारे स्वास्थ्य की रक्षा होती हैं ।प्रकृति के नियमों के पालन के लिये आवश्यक होता हैं कि हमें प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण सिध्दंतो के बारे में जानकारी हो जो हैं --प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिध्दांत हैं।"जीवन शैली"मनुष्य रोगी न बने इसके लिए प्राकृतिक चिकित्सा के दस आधार भूत सिध्दांत निम्न हैं--------- शेष अगले दिन ।
शनिवार, 22 मई 2021
प्राकृतिक चिकित्सा के सिध्दांत
मनुष्य प्रकृति का एक हिस्सा हैं ।उसका शरीर इन्हीं प्रकृति तत्व से बना हैं।प्राकृतिक चिकित्सा के सिध्दांत नितान्त मौलिक हैं ,इनके अनुसार प्राकृति के नियमों के उल्लंघन करने से रोग पैदा होते हैं तथा प्रकृतिक नियमों का पालन करते हुए पुनः निरोग हो सकते हैं ।मनुष्य शरीर में स्वभाविक रुप से एक ऐसी प्रकृति प्रदत्त पायी जाती हैं जो सदैव भीतरी व बाहरी हानिकारक प्रभावों से मानव की रक्षा करती हैं।जिसको नियमियता कहाँ जाता हैं और साधारण लोग जिसे जीवनी -शक्ति के नाम से पुकारते है,वहीं शक्ति सब प्रकार के रोगों के कारणों को स्वयमेव दूर करती हैं ।वह निरन्तर शरीर का पुनः निर्माण करती रहती हैंऔर जो टूट- फूट हो जाती हैं उसकी मरम्मत का भी ध्यान रखती हैं, साथ ही शरीर के भीतर अस्वभाविक तत्व पैदा हो जाते है या बाहर से पहुंच जाते हैं उन्हें निकालने का भी शरीर प्रयत्न करती रमती हैं।रोग मनुष्य के लिए अस्वभाविक अवस्था हैं जब वह प्राकृतिक नियम का उल्लंघन या विरुद्ध मार्ग पर चलने लगता हैं तो उसके शरीर में विजातीय द्रव्य की मात्रा बढऩे लगता हैं जिसके परिणाम स्वरूप शरीर में तरह-तरह के बिष उत्पन्न होने लगते है ओर वातावरण में पायेजाने वाले हानिकारक कीटाणुओं कीटाणुओं का भी उसपर आक्रमण होने लगता हैं, इससे शरीर का पोषण व सफाई करने वाले यंत्र निर्बल पड़ने लगते हैं ।उनके कार्यों में त्रुटि होने लगती हैं, और मनुष्य रोगी हो जाता हैं ।शरीर के भीतर रोग निरोधक शक्ति पर भारी पड़ती हैं जिसके द्वारा शरीर में उत्पन्न हुए अथवा बाहर से प्रवेश पाकर बाहर से पहुंचे हुए रोग कीटाणुओं का विनाश निरन्तर होता रहता हैं। उदाहरण---यदि आँख में कोई बिष कीटाणु जा पहुंचे तो निरन्तर आँसू निकलता हैं ।इन आँसुओं में लाइसोजीम नामक पदार्थ रहता हैं जिसकी निरोध शक्ति अद् भुत हैं।
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