रविवार, 13 जून 2021
जनता का मिला सहयोग प्रधानी चुनाव में 12 मतो से मिली विजय
शनिवार, 12 जून 2021
किस रोग में कौन सा योगासन
गुरुवार, 10 जून 2021
योगा टिप्स
रविवार, 6 जून 2021
प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत
8-- प्राकृतिक चिकित्सा में दवे रोग उभरते हैं -- प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा रोग भी उभरकर ठीक हो जाते हैं वर्तमान औषधि चिकित्सा में जहां उभरे रोग दब जाते हैं उसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सा में दबे रूम उभरते हैं जिसके कारण कई रूबी और विश्वास करते हैं लगते हैं कि उनकी बीमारियां बढ़ गई हैं जबकि बीमारियां बढ़ती नहीं है बल्कि वह प्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष में आ जाती हैं जिससे उनका उपचार किया जा सकता है प्राकृतिक चिकित्सा में संपूर्ण शरीर का उपचार किया जाता है जिससे संपूर्ण शरीर के विजातीय द्रव्य बाहर निकलते हैं जिससे शरीर में दबे अन्य रोग भी बाहर निकलते हैं जो उचित उपचार से जल्द ही चले जाते हैं! उभार को चिकित्सीय भाषा में रोग की तीव्र रोग की अपकर्ष अवस्था पुराने रोग का प्रत्यावर्तन रोग उत्पन्न संकट आज कई नामों से पुकारते हैं इस का सामान्य अर्थ है कि एक रोग का तीव्र अवस्था में अलग-अलग स्थानों में विश्व का बाहर निकलना जो उपद्रव कहलाते हैं प्राकृतिक चिकित्सा में इसे सकारात्मक रूप में लिया जाता है क्योंकि इसका अर्थ है हमारी जीवनी शक्ति अपना कार्य कर रही है जिस प्रकार एक सामान्य जोर की चिकित्सा के समय तीव्र सिर दर्द व पेट दर्द एवं दस्त भी हो सकते हैं क्योंकि सिर दर्द होने पर हम दवा से दबा देते हैं इसी प्रकार पेट दर्द होने पर भी हम इसे दवा से दबा देते हैं और दस्त को रोक शरीर में ही अलग-अलग स्थानों पर जमा हो जाता है और प्राकृतिक उपचार के समय या बाहर निकलने का प्रयास करता है जिससे सभी रूप उभर आते हैं लिए
एक प्राकृतिक चिकित्सक का कर्तव्य है कि इन सुधारों की अनदेखी न करें और तत्काल उनके चिकित्सा करें जिससे रोगी की जीवनी शक्ति का अधिक 69 हो रोगी को इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है रोगी को यह सोचना चाहिए कि उनका रोग छोड़ जड़ से समाप्त हो रहा है जिससे उसके दोबारा होने की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है
9-- प्राकृतिक चिकित्सा में मन शरीर तथा आत्मा तीनों की चिकित्सा की जाती है -- प्राकृतिक चिकित्सा में शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक तीनों पशुओं की चिकित्सा एक साथ की जाती है शरीर मन और आत्मा तीनों के सामंजस्य का नाम ही पूर्ण स्वस्थ है क्योंकि शरीर के साथ मन जब तक स्वस्थ नहीं है तब तक व्यक्ति को पूर्ण स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है और शरीर मन तभी स्वस्थ रह सकते हैं जब आत्मा स्वस्थ हो केवल शरीर को ही स्वस्थ रखना मनुष्य का कर्तव्य नहीं है क्योंकि मन और आत्मा शरीर के अभिन्न अंग है बिना मन के खुश हुए हमारी इंद्रियां कैसे खुश रह सकती हैं यदि मन स्वस्थ नहीं है तो विशालकाय शरीर में भी कुछ समय में समाप्त हो जाता है प्राकृतिक चिकित्सा में इन तीनों की स्वास्थ्य उन्नति पर बराबर ध्यान रखा जाता है
यह प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता है कि प्राकृतिक चिकित्सक मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य को उससे शारीरिक स्वास्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं और आत्मिक स्वास्थ्य बल को सर्वोपरि मानते हैं क्योंकि शरीर तभी स्वस्थ होगा जब आत्मा और मन स्वस्थ होता है
भारतीय दर्शन के अनुसार आध्यात्मिक रूप से मनुष्य ही पूर्ण रूप से स्वस्थ होता है वही जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है क्योंकि आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही एक स्वस्थ समाज की स्थापना कर सकता है जहां हिंसा गणेश क्रोध घृणा आज विकृत मानसिकता न पनप सकें प्राकृतिक चिकित्सा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही महत्व चिकित्सा राम नाम से कितना पर बल देती है जिससे मनुष्य आत्म संयम सीख सके और अपनी जीवनशैली को बदलकर संपूर्ण जीवन को उचित दिशा दे सके
10-- प्राकृतिक चिकित्सा में उत्तेजक औषधियों के सेवन का प्रश्न ही नहीं -- धीरे खाती है आज मिलने वाली दवा पर कुछ समय बाद प्रतिबंध लग जाता है सभी दवाओं पर सावधानी के निर्देश दिए रहते हैं प्रोफेसर एक क्लार्क के अनुसार हमारी सभी आरोग्य कारी औषधियां बिष हैं और इसके फलस्वरूप औषधि की हर एक मात्रा रोगी की जीवनी शक्ति का ह्रास करती है लिए
कीटाणु नाशक शक्ति को बढ़ाता है प्राकृतिक चिकित्सा में कितनी औषधियों का प्रयोग वर्जित माना जाता है प्राकृतिक चिकित्सा में विषय ली औषधियों को शरीर के लिए अनावश्यक ही नहीं घातक भी समझा जाता है प्राकृतिक चिकित्सा है दवा नहीं औषधि का काम रोग छुड़ाना नहीं है बल्कि यह वह सामग्री है जो प्रकृति के द्वारा मरम्मत के काम में लाई जाती है इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा में सभी सो प्राण खाद्य सामग्री यही औषधि हैलिए
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समाप्त l
विश्व पर्यावरण दिवस पर राज्य मन्त्री ने किया वृक्षा रोपड़*
विश्व पर्यावरण दिवस पर राज्य मंत्री न
*विश्व पर्यावरण दिवस पर राज्य मन्त्री ने किया वृक्षा रोपड़*
रूद्रपुर देवरिया कोरोना काल मे पर्यावरण असुन्तल होने पर आक्सीजन की कमी से हुयी मौत पर पूरा विश्व सहमा हुआ है पर्यावरण की महत्ता को देखते हुये विश्व पर्यावरण दिवस पर रूद्रपुर नगर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रो में वृक्षा रोपड़ कर विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया
उत्तर प्रदेश के राज्य मन्त्री जय प्रकाश निषाद ने तहसील परिसर मे पत्रकार एकता समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष विश्वामित्र ने तहसील नगर पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि बिरेन्द्र शर्मा काशीपुर कालोनी मे वृक्षा रोपड कर बृक्ष लगाने की अपील की
रूद्रपुर विधान सभा के ग्राम छपौली में पूर्व बिधायक अनुग्रह नारायण खोखा सिंह के प्रतिनिधि हरेन्द्र सिंह त्यागी जी के नेतृत्व में शनिवार को ग्राम छपौली मे वृक्षारोपण किया गया
हरेंद्र सिंह त्यागी ने क्षेत्र वासियो से अपील करते हुए कहा की आज के पारिवेश मे मानव के जीवने में सवसे अहम भूमिका वृक्ष है सभी की एक वृक्ष लगाकर पर्यावरण को शुद्ध बनाने में सहयोग करे
साथ में सयूस के ज़िला उपाध्यक्ष जितेश यादव ने भी लोगो से अपील किया कि पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखने के लिए एक वृक्ष ज़रूर लगाए
सछस के बिधान सभा अध्यक्ष ने भी वृछ लगाने के लिए कहा वृक्षारोपड़ कार्यक्रम में छपौली के ग्राम प्रधान गोपाल गुप्ता, दीपू यादव, श्रवण वर्मा, सतीशचंद्र गुप्ता, रामकृपाल निषाद, विनोद निषाद, जुल्फेकार अली, उदयराज वर्मा, वंशबहादुर निषाद, पंकज निषाद, हंसनाथ निषाद कन्हैयालाल गुप्ता जितेंद्र गुप्ता आदि लोग थे
शनिवार, 5 जून 2021
पर्यावरण संरक्षण मंच ने किया वृक्षारोपण
"विश्व पर्यावरण दिवस" के अवसर पर 'पर्यावरण संरक्षण मंच' रुद्रपुर द्वारा बुद्धा सेंट्रल एकेडमी कोईलगड़हा व पीएन एकेडमी मलटोलिया बैरियाघाट में किया गया ।वृक्षारोपण इस अवसर पर मंच के अध्यक्ष संजय कुमार गुप्त 'अबोध', सचिव राणाप्रताप सिंह, शिवानन्द विश्वकर्मा, सत्राजीत मणि त्रिपाठी, तारकेश्वर विश्वकर्मा, संजय कुमार यादव, श्यामसुंदर यादव, कमल कुमार यादव, जिला पंचायत सदस्य पुष्पा देवी, प्रतिनिधि मुनीलाल मद्धेशिया, बृजेश जायसवाल, दुर्गेश गुप्ता, रजनीकान्त श्रीवास्तव, विकास विश्वकर्मा, सोनू यादव, अविनाश यादव, गोविंद गोंड़, मुन्ना यादव, अर्जुन यादव, छोटेलाल यादव, विन्दा देवी आदि पदाधिकारीगण व सदस्यगण उप ऑक्सीजन सिलेंडर से बचना है तो वृक्षारोपण करना है स्थित रहे ।
शुक्रवार, 4 जून 2021
प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत
अगले अंक का शेष --------
5- चिकित्सा रोग की नहीं संपूर्ण शरीर की होती है -- प्राकृतिक चिकित्सा में चिकित्सा रोग की नहीं बल्कि रोगी की होती है!अन्य चिकित्सा पद्धतियों में केवल रोग निवारण पर बल दिया जाता है,परंतु प्राकृतिक चिकित्सा केवल रोग का ही नहीं अपितु संपूर्ण शरीर की चिकित्सा करती है! जिससे रोग स्वत : मिट जाता हैं! क्योंकि रोग का मूल कारण तो शरीर में एकत्र बिष है, जैसे सिर दर्द होने पर अधिकांश लोग दवाओं का प्रयोग करते हैं!जिससे कुछ समय के लिए दर्द समाप्त हो जाता है! लेकिन बार-बार होता रहता है,क्योंकि उसकी जड़ तो कहीं और होती है प्राकृतिक चिकित्सा में पेट तथा आंतों को साफ करके सिरदर्द को पूर्ण रूप से समाप्त किया जाता है!
चिकित्सा और शरीर की सफाई से सारे रोग एक के बाद एक करके समाप्त हो जाते हैं, इसलिए केवल रोग की चिकित्सा न कर के संपूर्ण शरीर की चिकित्सा की जाती है!
6-- प्राकृतिक चिकित्सा में निदान की विशेष आवश्यकता नहीं है -- प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत के अनुसार सभी रोग एक ही है,और उनके कारण भी एक ही है ऐसी अवस्था में रोग निदान की विशेष आवश्यकता नहीं रह जाती है! वर्तमान समय में रोग के निदान के लिए बड़ी-बड़ी मशीनें व उपकरण प्रयोग में लाए जाते हैं जिसके माध्यम से शरीर में रोग का पता लगाया जाता है, जिस के विपरीत प्रभाव रोगी पर देखने को मिलते हैं एक्सरे मशीन से आंखों की रोशनी प्रभावित होती है, गर्भाशय शिशु पर विपरीत प्रभाव पड़ता है!यहां तक कि बच्चा अपंग पैदा हो सकता है इस प्रकार की मशीनों के अत्यधिक प्रयोग से रोग निवारण नहीं बल्कि रोग को बढ़ाया जा रहा है जिससे शरीर और दूषित होता है!, इसके अतिरिक्त रोगी पर अत्यधिक आर्थिक दबाव पड़ता है,जिससे वह मानसिक रूप से छुब्द हो जाता है! लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा में किसी भी उपकरण की सहायता के बिना आकृति निदान की व्यवस्था है,रोगी की आकृति को देखकर सिर्फ या पता लगाना है, कि शरीर के किस भाग पर विजातीय द्रव्य की अधिकता है चेहरे को देखकर गर्दन को देखकर और पेट को देखकर ही रोग का निदान किया जाता है जो एक बहुत ही सरल और सहज प्रक्रिया है, रोगी को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती और आर्थिक दबाव बिल्कुल नहीं होता है!
7- जिरण् रोगी के आरोग्य में समय लग सकता है -- जीरन रोगी का अर्थ है जिससे रोग लंबे समय से बैठा है उसे समाप्त करने में समय लगता है जिरंड रोग न तो बहुत जल्दी आते हैं और ना ही पलक झपकते ठीक हो सकते हैं जिरंड रोग उस पेड़ के समान होते हैं जो कई वर्षों से अपनी जड़ें जमाए हुए हैं इसलिए उसकी जड़ें जमीन में बहुत अंतर तक चली जाती है पेड़ को पत्ते तने से बहुत जल्दी काटा जा सकता है!इसी प्रकार जीरण्ड रोग शरीर में बहुत जगह बना लेते हैं और उन्हें जड़ से मिटाने में थोड़ा समय लगता है
वर्तमान समय की चिकित्सा पद्धति रोग के लक्षणों को मिटती है जो कुछ समय के लिए होते हैं! और बार बार उभर कर सामने आते रहते हैं क्योंकि जल्दी आराम पाने के चक्कर में औषधियों के माध्यम से रोग रूपी पेड़ के तने को काटते हैं जिसके कुछ समय बाद फिर अंकुर आकर बड़े पेड़ बन जाते हैं! लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा रोग को जड़ से मिटाने का प्रयास करती है और साथ ही जीवनी शक्ति का विकास करती है,जो कि औषधियों के सेवन से नस्ट होती है
यह मनुष्य का दुर्भाग्य है कि वह प्रकृति से दूर होता जा रहा है! और कृत्रिम दुनिया में जी रहा है! आज की औषधियां इसी का उदाहरण है जिसें खा जिसे खाकर मनुष्य सोचता है किवह स्वास्थ्य को प्राप्त कर रहा है परंतु सत्य है कि वह खुशी से जहर खा रहा है जो धीरे-धीरे उसे अंदर से खाए जा रहा है जिसका पता उसे कुछ समय बीत जाने के बाद लगता है जब वह एक रोग को दूर करने के लिए ली गई औषधियों के कारण दूसरे रोग को आमंत्रित कर देता है!
प्राकृतिक चिकित्सा में जिंरंड रोगी के स्वास्थ्य लाभ के लिऐ समय लगने का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि व्यक्ति हर जगह से थक हार कर उसकी ओर मुड़ता है और फिर अपने साथ जगह-जगह से एकत्र किया हुआ औषधि से रोग लेकर आता है जो प्राकृतिक चिकित्सा के कार्य की और भी बढ़ा देता है रोज इससे रोगी के आरोग्य लाभ में समय लग सकता है इसलिए रोगी को पूर्ण धैर्य पूर्वक प्राकृतिक चिकित्सा करानी चाहिए जिससे पूर्ण लाभ मिल सके!
शेष अगले अंक में--------
14 फरवरी से खुलेंगे नर्सरी से ऊपर के शैक्षणिक संस्थानरेस्टोरेंट सिनेमा हॉल अपनी क्षमता के अनुसार होंगे संचालित
समस्त सरकारी एवं निजी कार्यालयों में शत-प्रतिशत उपस्थिति के साथ अब होंगे कार्य जिम खोलने की भी अनुमति कोविड हेल्प डेस्क की स्थाप...
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